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Happy Independence Day

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 🇮🇳तिरंगा-: बो लोग कहा है                        -: जिसने कुछ हो कहा          -: मेरा जब अपमान हुआ था                       -: सब ने देखा          -: तोड़ दिया उस भारत को                       -: जो सदियों से सम्मानित था                     -: मेरा दिल भी रोया था                       -: जब तिरंगा था फेका Direction -: #26_january #Republic_Day #किसान_आंदोलन #लालकिला #दिल्ली #भारत  Writter -: Rohit Singh Thakur

🖌️—"चमक उठी सन् 57 में,वह तलवार पुरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो,झाँसी वाली रानी थी"।#रानी_लक्ष्मीबाई_जी की पुण्यतिथि पर शत शत नमन🖌️—प्रथम स्वाधीनता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने वाली महान योद्धा, अद्वितीय तेजस्विता, अद्भुत बलिदान, अदम्य साहस एवं नारी शक्ति की अप्रतिम प्रतीक झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जी को उनकी पुण्यतिथि पर कोटिशः श्रद्धांजलि।आपका बलिदानी जीवन प्रत्येक भारतीय के लिए महान प्रेरणा है।🖌️🖌️ पुण्यतिथि विशेष: झांसी की रानी पर लिखी यह कविता आज भी है शक्ति का स्रोत🖌️ 1857 की वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म 18 नवम्बर 1828 को तथा निधन 18 जून 1858 को हुआ था। उनकी पुण्यतिथि में हम उन पर लिखी एक बहुत प्रचलित कविता पेश करने जा रहे हैं। जो हर बार पढ़ने पर नई लगती है।❤️ रानी लक्ष्मीबाई (जन्म: 18 नवम्बर 1828[1] – मृत्यु: 18 जून 1858) मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी और 1857 की राज्यक्रान्ति की द्वितीय शहीद वीरांगना (प्रथम शहीद वीरांगना रानी अवन्ति बाई लोधी 20 मार्च 1858 हैं) थीं। उन्होंने सिर्फ 29 वर्ष की उम्र में अंग्रेज साम्राज्य की सेना से युद्ध किया और रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुईं। बताया जाता है कि सिर पर तलवार के वार से शहीद हुई थी लक्ष्मीबाई।[2] ❤️ #फ़र्रूख़ाबाद_के_नवाब_के_महल_में_रानीलक्ष्मीबाई_का_कलात्मक_चित्रण 👉 कमेंट बॉक्स❤️पूर्ववर्ती__________गंगाधर रावउत्तरवर्ती____________ब्रितानी राजजन्म____________मणिकर्णिका ताम्बे 19 नवम्बर 1828 वाराणसी, भारतनिधन_______18th जून 1858 उम्र 30 कोटा। की सराय, ग्वालियर, भारतजीवनसंगी_______झाँसी नरेश महाराज गंगाधर राव नेवालकरसंतान___दामोदर राव, आनन्द राव (गोद लिया)घराना_________________नेवालकरपिता________________मोरोपन्त ताम्बेमाता_______________भागीरथी सापरे🖌️ लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी में 18 नवम्बर 1828 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। उनकी माँ का नाम भागीरथीबाई और पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। माता भागीरथीबाई एक सुसंस्कृत, बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ स्वभाव की थी तब उनकी माँ की मृत्यु हो गयी। क्योंकि घर में मनु की देखभाल के लिये कोई नहीं था इसलिए पिता मनु को अपने साथ पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में ले जाने लगे। जहाँ चंचल और सुन्दर मनु को सब लोग उसे प्यार से "छबीली" कहकर बुलाने लगे। मनु ने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्र की शिक्षा भी ली।[3] सन् 1842 में उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। सितंबर 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। परन्तु चार महीने की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गयी। सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया।[2]🖌️ 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को समर्पित भारत का डाकटिकट जिसमें लक्ष्मीबाई का चित्र है।झाँसी 1857 के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया। झलकारी बाई जो लक्ष्मीबाई की हमशक्ल थी को उसने अपनी सेना में प्रमुख स्थान दिया।[5]1857 के सितम्बर तथा अक्टूबर के महीनों में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलतापूर्वक इसे विफल कर दिया। 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया। परन्तु रानी दामोदर राव के साथ अंग्रेज़ों से बच कर भाग निकलने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिली।[6]तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक क़िले पर क़ब्ज़ा कर लिया। बाजीराव प्रथम के वंशज अली बहादुर द्वितीय ने भी रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया और रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हें राखी भेजी थी इसलिए वह भी इस युद्ध में उनके साथ शामिल हुए। 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रितानी सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु हो गई। लड़ाई की रिपोर्ट में ब्रितानी जनरल ह्यूरोज़ ने टिप्पणी की कि रानी लक्ष्मीबाई अपनी सुन्दरता, चालाकी और दृढ़ता के लिये उल्लेखनीय तो थी ही, विद्रोही नेताओं में सबसे अधिक ख़तरनाक भी थी।[7]ब्रितानी राज ने अपनी राज्य हड़प नीति के तहत बालक दामोदर राव के ख़िलाफ़ अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया। हालांकि मुक़दमे में बहुत बहस हुई, परन्तु इसे ख़ारिज कर दिया गया। ब्रितानी अधिकारियों ने राज्य का ख़ज़ाना ज़ब्त कर लिया और उनके पति के कर्ज़ को रानी के सालाना ख़र्च में से काटने का फ़रमान जारी कर दिया। इसके परिणाम स्वरूप रानी को झाँसी का क़िला छोड़कर झाँसी के रानीमहल में जाना पड़ा। पर रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होनें हर हाल में झाँसी राज्य की रक्षा करने का निश्चय किया।[4]सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। 🖌️ 1857 की वीरांगना...कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। 1857 की वीरांगना...लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।1857 की वीरांगना...हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।1857 की वीरांगना...उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।1857 का संग्राम वर्ष 1857 में यह अफवाह फैल गई कि भारतीय सैनिकों को जो हथियार दिए गए हैं उनमें गाय और सूअर की चर्बी का प्रयोग किया गया है. इस बात से भारतीय सैनिक अंग्रेजी सरकार के विरोध में आ गए और उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से देश को आजाद करवाने का प्रण ले लिया. हजारों सैनिकों ने इस प्रण को निभाते हुए अपनी जान दे दी. यह विद्रोह मेरठ से शुरू होकर बरेली और दिल्ली में भी पहुंचा. हालांकि संपूर्ण भारत से तो अंग्रेजी सरकार को नहीं हटाया जा सका लेकिन झांसी समेत कई राज्यों से अंग्रेजों को हटा दिया गया. इस विद्रोह के बाद झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने दोबारा अपने राज्य पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया और अपने राज्य को अंग्रेजों से बचाने के लिए भी हरसंभव प्रयत्न किए. मार्च 1858 में सर ह्यूरोज को झांसी की रानी को जिंदा गिरफ्तार करने के उद्देश्य से झांसी भेजा गया. ह्यूरोज ने लक्ष्मीबाई को आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया लेकिन लक्ष्मीबाई ने अपनी झांसी को बचाने के लिए अकेले जंग का ऐलान कर दिया. लगातार तीन दिनों तक गोलीबारी होने के बावजूद अंग्रेजी सेना किले तक नहीं पहुंच पाई. जिसके परिणामस्वरूप ह्यूरोज ने पीछे से वार करने का निर्णय लिया. विश्वासघात का सहारा लेकर ह्यूरोज और उसकी सेना 3 अप्रैल को किले में दाखिल हो गई. अपने बारह वर्ष के बेटे को पीठ पर बांधकर लक्ष्मीबाई किले से बाहर निकल गईं.कालपी की लड़ाई जब ह्यूरोज ने झांसी के किले पर कब्जा जमा लिया तब अपनी जान बचाने के लिए लक्ष्मीबाई को वहां से भागना ही पड़ा. लगातार चौबीस घंटे का सफर और 102 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद लक्ष्मीबाई कालपी पहुंची. कालपी के पेशवा ने स्थिति का आंकलन कर लक्ष्मीबाई की सहायता करने का निर्णय लिया. पेशवा ने रानी को जरूरत के अनुसार अपनी सेना और हथियार देने का फैसला किया. 22 मई को ह्यूरोज ने कालपी पर आक्रमण कर दिया. इस आक्रमण का सामना झांसी की रानी ने पूरी दृड़ता से किया. यहां तक कि ब्रिटिश सेना भी उनके इस आक्रमण से घबरा गई थी. लेकिन दुर्भाग्यवश 24 मई को ह्यूरोज ने कालपी पर अधिकार कर लिया. राव साहेब पेशवा, तात्यां टोपे और लक्ष्मी बाई ने ग्वालियर जाने का फैसला किया, लेकिन ग्वालियर के राजा अंग्रेजों के साथ थे. लक्ष्मी बाई ने युद्ध कर राजा को हरा दिया और किला पेशवा को सौंप दिया.AMPस्वतंत्रता के लिए प्राणों का बलिदान 17 जून को ह्यूरोज ने ग्वालियर पर कब्जा कर लिया. लेकिन झांसी की रानी ने आत्म-समर्पण का रास्ता ना चुन कर सेना का सामना करने का निश्चय किया. झांसी की रानी अपने घोड़े पर नहीं बल्कि किसी और घोड़े पर बैठ कर युद्ध लड़ रही थीं. वह पुरुषों के कपड़े में थीं इसीलिए घायल होने के बाद उन्हें कोई पहचान नहीं पाया. लक्ष्मीबाई के विश्वसनीय सहायक उन्हें लेकर पास के एक वैद्य के पास ले गए और उन्हें गंगाजल पिलाया गया. रानी लक्ष्मीबाई की अंतिम इच्छा थी कि उनके शव को कोई भी अंग्रेज हाथ ना लगा पाए. 23 वर्ष की छोटी सी आयु में ही लक्ष्मीबाई ने अपने प्राणों की आहुति दे दी. कुछ समय पश्चात उनके पिता मोरोपंत तांबे को भी अंग्रेजों द्वारा फांसी दे दी गई. लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव अपनी मां के सहायकों के साथ वहां से भाग गए. हालांकि उन्हें कभी उत्तराधिकार नहीं मिला लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें पेंशन देने की व्यवस्था की थी. दामोदर राव इन्दौर में जाकर रहने लगे. 28 मई, 1906 को 58 वर्ष की उम्र में दामोदर राव का भी निधन हो गया. उनके वंशजों ने उपनाम के रूप में झांसीवाले ग्रहण किया.रानी लक्ष्मीबाई एक वीर और साहसी महिला थीं. भले ही उनकी उम्र ज्यादा नहीं थी लेकिन उनके निर्णय हमेशा परिपक्व हुआ करते थे. अंतिम श्वास तक वह अंग्रेजों से लोहा लेती रहीं. उन्होंने स्वतंत्रता के लिए प्रायसरत लोगों के लिए एक आदर्श उदाहरण पेश किया था. ह्यूरोज जो उनके शत्रु से कम नहीं थे, ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि उन्होंने जितने भी विरोधियों का सामना किया उनमें सबसे अधिक खतरा उन्हें लक्ष्मी बाई से ही था. वह सबसे अधिक साहसी और दृढ़ निश्चयी थीं. #कविता🖌️🖌️🖌️🖌️🖌️ झांसी की रानी कविता संपादित करेंसुभद्रा कुमारी चौहान जी ने रानी लक्ष्मीबाई की वीरता से प्रभावित होकर उनके यश का गान करते हुए झांसी की रानी कविता की रचना की है[8]-- ❤️ सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में।चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थीछिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

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Sushant Singh Rajput 14 june 2020 RIP

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#सुशांत सिंह राजपूत की प्रथम पुण्यतिथि पर कोटि कोटि नमन आज ही के दिन आपको इस बनावटी दुनिया फिल्म इंडस्ट्री ने निगल लिया था  🖌️13 जून, हमारे प्यारे सुशांत सिंह राजपूत की आखिरी सुबह... मुझे आश्चर्य है कि वह इस दिन क्या कर रहे थे सी.बी.आई को एक साल बीत चुका है और अभी भी अपराधी कई सबूतों के बावजूद मुक्त घूम रहे हैं क्या शर्म की बात है! 🖌️मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि आप इस दुनिया में नहीं हैं। सर्वशक्तिमान हमारे लिए इतना क्रूर नहीं हो सकता। कहाँ हो सुशांत भाई ?? जब हम फिर से आपकी प्यारी सी मुस्कान देख पाएंगे ?? 🖌️.13th June ,the last morning of our beloved SSR.... I wonder wht he was going through on this day CBI one year has been passed nd still Culprits r roaming free despite of many evidences u couldn't file 302 yet ? Wht a Shame ! 🖌️I Can't believe You Are not in this World. Almighty Can't be so cruel for us. Where Are You Sushant Bhai?? When we Will able to See ur Sweet Smile Again??

जय महाकाल

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आल्हा उदल जयंती

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#महान_चंद्रवंशी_क्षत्रिय_राजपूत_योद्धा_आल्हा_ऊदल_जी_की_जयंती_की_हार्दिक_ #शुभकामनाएँ  #जय_राजपूताना_हमारे_पूर्वज_अमर_रहे_अमर_रहे ❤❤🌹🌹 #राजपूतयोद्धाआल्हाउडल #वीर_चन्द्रवंशी_आल्हा_उदल 🌹🌹 आल्हा मध्यभारत में स्थित ऐतिहासिक बुंदेलखण्ड के सेनापति थे और अपनी वीरता के लिए विख्यात थे। आल्हा के छोटे भाई का नाम ऊदल था और वह वीरता में अपने भाई से बढ़कर ही थें। जगनेर के राजा जगनिक ने आल्ह-खण्ड नामक एक काव्य रचा था उसमें इन दोनों वीरों की 52 लड़ाइयों की गाथा वर्णित है।[1] ऊदल ने अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु पृथ्वीराज चौहान से युद्ध करते हुए ऊदल वीरगति प्राप्त हुए । आल्हा अपने छोटे भाई की वीरगति की खबर सुनकर अपना आपा खो बैठे और पृथ्वीराज चौहान की सेना पर मौत बनकर टूट पड़े आल्हा के सामने जो आया मारा गया । लगभग एक घंटे के घनघोर युद्ध की के बाद पृथ्वीराज चौहान और आल्हा आमने-सामने थे, दोनों में भीषण युद्ध हुआ, पृथ्वीराज चौहान बुरी तरह घायल हुए आल्हा के गुरु गोरखनाथ के कहने पर आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दिया और बुंदेलखंड के महा-योद्धा आल्हा ने नाथ पंथ स्वीकार कर लिया । आल्हा चंदेल राजा परम...

क्षत्रिय_चौहान_वंश_के_राजा 🙏🙏🙏#भारतवर्ष को अपने #पराक्रम और #वीरता के #बल पर #गौरवान्वित करने वाले #हिन्दू #सम्राट #क्षत्रिय #शिरोमणि #पृथ्वीराज_चौहान जी की #जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि #नमन।

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#क्षत्रिय_चौहान_वंश_के_राजा 🙏🙏🙏 #भारतवर्ष को अपने #पराक्रम और #वीरता के #बल पर #गौरवान्वित करने वाले #हिन्दू #सम्राट #क्षत्रिय #शिरोमणि #पृथ्वीराज_चौहान जी की #जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि #नमन।🙏🙏🙏🙏 #PrithvirajChauhan2021 पृथ्वीराज तृतीय (शासनकाल: 1178–1192) जिन्हें आम तौर पर पृथ्वीराज चौहान कहा जाता है, चौहान वंश के राजा थे। उन्होंने वर्तमान उत्तर-पश्चिमी भारत में पारंपरिक चौहान क्षेत्र सपादलक्ष पर शासन किया। उन्होंने वर्तमान राजस्थान, हरियाणा, और दिल्ली और पंजाब, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से पर भी नियंत्रण किया। उनकी राजधानी अजयमेरु (आधुनिक अजमेर) में स्थित थी, हालांकि मध्ययुगीन लोक किंवदंतियों ने उन्हें भारत के राजनीतिक केंद्र दिल्ली के राजा के रूप में वर्णित किया है जो उन्हें पूर्व-इस्लामी भारतीय शक्ति के प्रतिनिधि के रूप में चित्रित करते हैं। पूरा नाम _________.#पृथ्वीराज चौहान अन्य नाम__________ राय पिथौरा जन्म ______________1149 ई. मृत्यु तिथि ___________ 1248 पिता,माता___राजा सोमेश्वर चौहान,कमलादेवी पत्नी______________ #संयोगिता शासन काल ___________...