आल्हा उदल जयंती
#महान_चंद्रवंशी_क्षत्रिय_राजपूत_योद्धा_आल्हा_ऊदल_जी_की_जयंती_की_हार्दिक_
#शुभकामनाएँ
#जय_राजपूताना_हमारे_पूर्वज_अमर_रहे_अमर_रहे ❤❤🌹🌹
#राजपूतयोद्धाआल्हाउडल
#वीर_चन्द्रवंशी_आल्हा_उदल 🌹🌹
आल्हा मध्यभारत में स्थित ऐतिहासिक बुंदेलखण्ड के सेनापति थे और अपनी वीरता के लिए विख्यात थे। आल्हा के छोटे भाई का नाम ऊदल था और वह वीरता में अपने भाई से बढ़कर ही थें। जगनेर के राजा जगनिक ने आल्ह-खण्ड नामक एक काव्य रचा था उसमें इन दोनों वीरों की 52 लड़ाइयों की गाथा वर्णित है।[1]
ऊदल ने अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु पृथ्वीराज चौहान से युद्ध करते हुए ऊदल वीरगति प्राप्त हुए । आल्हा अपने छोटे भाई की वीरगति की खबर सुनकर अपना आपा खो बैठे और पृथ्वीराज चौहान की सेना पर मौत बनकर टूट पड़े आल्हा के सामने जो आया मारा गया । लगभग एक घंटे के घनघोर युद्ध की के बाद पृथ्वीराज चौहान और आल्हा आमने-सामने थे, दोनों में भीषण युद्ध हुआ, पृथ्वीराज चौहान बुरी तरह घायल हुए आल्हा के गुरु गोरखनाथ के कहने पर आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दिया और बुंदेलखंड के महा-योद्धा आल्हा ने नाथ पंथ स्वीकार कर लिया ।
आल्हा चंदेल राजा परमर्दिदेव (परमल के रूप में भी जाने-जाते हैं) के एक महान सेनापति थे, जिन्होंने 1182 ई० में पृथ्वीराज चौहान से लड़ाई लड़ी, जो आल्हा-खांडबॉल में अमर हो गए।
उत्पत्ति
आल्हा और ऊदल, चंदेल राजा परमल के सेनापति दसराज के पुत्र थे। वे बनाफर वंश के थे, जो कि चंद्रवंशी क्षत्रिय समुदाय है। मध्य-काल में आल्हा-ऊदल की गाथा राजपूत शौर्य का प्रतीक दर्शाती है। [2]
आल्हा-उदल के माता-पिता को लेकर गाथा में कोई विकल्प नहीं मिलता। दोनों दसराज (जसराज) और दिवला (देवल दे) के पुत्र हैं। कन्नौजी पाठ के अनुसार आल्हा का जन्म दशपुरवा (दशहर पुर, महोबा की सीमा पर एक छोटा-सा गाँव) में हुआ था। आल्हा की जन्म तिथि जेठी दशहरा बताई जाती है। आल्हा से ऊदल लगभग बारह वर्ष छोटा था। पिता की हत्या के बाद उसका जन्म हुआ था। [3] ग्रियर्सन के अनुसार बनाफरो की पत्नियाँ मूलतः अच्छे परिवारों की थीं। बाद में उन्हें अहीर कहा गया। कदाचित् माहिल ने बैर भाव से यह अफवाह फैला दी हो। महोबा में, विवाह-संबंधों के संदर्भ में बनाफर "ओछी जात के राजपूत" कहे गए हैं।।[4]
पं० ललिता प्रसाद मिश्र ने अपने ग्रन्थ आल्हखण्ड की भूमिका में आल्हा को युधिष्ठिर और ऊदल को भीम का साक्षात अवतार बताते हुए लिखा है - "यह दोनों वीर अवतारी होने के कारण अतुल पराक्रमी थे। ये प्राय: १२वीं विक्रमीय शताब्दी में पैदा हुए और १३वीं शताब्दी के पुर्वार्द्ध तक अमानुषी पराक्रम दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये। ऐसा प्रचलित है की ऊदल की पृथ्वीराज चौहान द्वारा हत्या के पश्चात आल्हा ने संन्यास ले लिया और जो आज तक अमर है और गुरु गोरखनाथ के आदेश से आल्हा ने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया था, पृथ्वीराज चौहान के परम मित्र संजम भी महोबा की इसी लड़ाई में आल्हा उदल के सेनापति बलभद्र तिवारी जो कान्यकुब्ज और कश्यप गोत्र के थे उनके द्वारा मारा गया था । वह शताब्दी वीरों की सदी कही जा सकती है और उस समय की अलौकिक वीरगाथाओं को तब से गाते हम लोग चले आते हैं। आज भी कायर तक उन्हें (आल्हा) सुनकर जोश में भर अनेकों साहस के काम कर डालते हैं। यूरोपीय महायुद्ध में सैनिकों को रणमत्त करने के लिये ब्रिटिश गवर्नमेण्ट को भी इस (आल्हखण्ड) का सहारा लेना पड़ा था।"[5]
#आल्हा_ऊदल_सैकड़ों_साल_से_कर_रहे_हैं_माँ_शारदा_की_आरती
आल्हा और ऊदल दो भाई थे। ये बुन्देलखण्ड के महोबा के वीर योद्धा और परमार के सामंत थे। कालिंजर के राजा परमार के दरबार में जगनिक नाम के एक कवि ने आल्हा खण्ड नामक एक काव्य रचा था उसमें इन वीरों की गाथा वर्णित है। इस ग्रंथ में दों वीरों की 52 लड़ाइयों का रोमांचकारी वर्णन है। आखरी लड़ाई उन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ लड़ी थी। मां शारदा माई के भक्त आल्हा आज भी करते हैं मां की पूजा और आरती। जो इस पर विश्वास नहीं करता वे अपनी आंखों से जाकर देख सकता है।
आल्हाखण्ड ग्रंथ : आल्हाखण्ड में गाया जाता है कि इन दोनों भाइयों का युद्ध दिल्ली के तत्कालीन शासक पृथ्वीराज चौहान से हुआ था। पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में हारना पड़ा था लेकिन इसके पश्चात आल्हा के मन में वैराग्य आ गया और उन्होंने संन्यास ले लिया था। कहते हैं कि इस युद्ध में उनका भाई वीरगति को प्राप्त हो गया था। गुरु गोरखनाथ के आदेश से आल्हा ने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया था। पृथ्वीराज चौहान के साथ उनकी यह आखरी लड़ाई थी।
मान्यता है कि मां के परम भक्त आल्हा को मां शारदा का आशीर्वाद प्राप्त था, लिहाजा पृथ्वीराज चौहान की सेना को पीछे हटना पड़ा था। मां के आदेशानुसार आल्हा ने अपनी साग (हथियार) शारदा मंदिर पर चढ़ाकर नोक टेढ़ी कर दी थी जिसे आज तक कोई सीधा नहीं कर पाया है। मंदिर परिसर में ही तमाम ऐतिहासिक महत्व के अवशेष अभी भी आल्हा व पृथ्वीराज चौहान की जंग की गवाही देते हैं।
सबसे पहले आल्हा करते हैं माता की आरती : मान्यता है कि मां ने आल्हा को उनकी भक्ति और वीरता से प्रसन्न होकर अमर होने का वरदान दिया था। लोगों की मानेंं तो आज भी रात 8 बजे मंदिर की आरती के बाद साफ-सफाई होती है और फिर मंदिर के सभी कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इसके बावजूद जब सुबह मंदिर को पुन: खोला जाता है तो मंदिर में मां की आरती और पूजा किए जाने के सबूत मिलते हैं। आज भी यही मान्यता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा और ऊदल ही करते हैं।
बुंदेली इतिहास का महानायक : बुंदेली इतिहास में आल्हा-ऊदल का नाम बड़े ही आदरभाव से लिया जाता है। बुंदेली कवियों ने आल्हा का गीत भी बनाया है, जो सावन के महीने में बुंदेलखंड के हर गांव-गली में गाया जाता है। जैसे पानीदार यहां का पानी आग, यहां के पानी में शौर्य गाथा के रूप से गाया जाता है। यही नहीं, बड़े लड़ैया महोबे वाले खनक-खनक बाजी तलवार आज भी हर बुंदेलों की जुबान पर है।
शारदा शक्तिपीठ का परिचय : मध्यप्रदेश के सतना जिले में मैहर तहसील के पास त्रिकूट पर्वत पर स्थित माता के इस मंदिर को मैहर देवी का शक्तिपीठ कहा जाता है। मैहर का मतलब है मां का हार। माना जाता है कि यहां मां सती का हार गिरा था इसीलिए इसकी गणना शक्तिपीठों में की जाती है। करीब 1,063 सीढ़ियां चढ़ने के बाद माता के दर्शन होते हैं। पूरे भारत में सतना का मैहर मंदिर माता शारदा का अकेला मंदिर है।
कहते हैं कि दोनों भाइयों ने ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदादेवी के इस मंदिर की खोज की थी। आल्हा ने यहां 12 वर्षों तक माता की तपस्या की थी। आल्हा माता को शारदा माई कहकर पुकारा करते थे इसीलिए प्रचलन में उनका नाम शारदा माई हो गया। इसके अलावा, ये भी मान्यता है कि यहां पर सर्वप्रथम आदिगुरु शंकराचार्य ने 9वीं-10वीं शताब्दी में पूजा-अर्चना की थी। माता शारदा की मूर्ति की स्थापना विक्रम संवत 559 में की गई थी
____________________________________
🟩🟩🟩🟩🟩🟩🟩🟩🟩🟩🟩🟩🟩
1 आल्हा और ऊदल का परिचय
बुंदेलखंड की वीर भूमि महोबा में जन्मे आल्हा और ऊदल दो भाई थे. आल्हा और ऊदल के पिता जच्छराज (जासर) और माता देवला थी. आल्हा और उदल परमार के सामंत थे और बनाफर शाखा के क्षत्रीय थे. आल्हा और ऊदल नाम के वीर योद्धाओं की वीर गाथओं का वर्णन आज भी उतर भारत के गांव -गांव में किया जाता हैं. आल्हा और ऊदल को कई वीरों के समान बताया गया हैं.
2
युधिष्ठिर और भीम का अवतार
किसी प्रसिद कवि ने आल्हा को धर्मराज युधिष्ठिर और ऊदल को भीम का साक्षात अवतार बताया हैं. कही-कही पर आल्हा को धर्मराज और ऊदल को अर्जुन का रूप बताया गया हैं. दोनों भाइयों आल्हा और ऊदल का जन्म 12वीं विक्रमीय शताब्दी में हुआ और 13वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक दोनों वीरगति को प्राप्त हो गए. दोनों भाई जन्म से ही पराकर्मी और श्रेष्ठ थे।
3
युधिष्ठिर और भीम का अवतार
आल्हा को युधिष्ठिर के समकक्ष इसलिए माना जाता था क्योंकि जिस तरह युधिष्ठिर महाभारत के युद्ध के बाद वैराग्य से भर गए थे वैसे ही आल्हा का हाल था। जब आल्हा ने महोबा में हजारों सैनिकों के सिर कटे हुए देखे तो उन्हें पश्चाताप हुआ कि इतने सैनिक आखिर मारे किसलिए।
युधिष्ठिर और भीम का अवतार4/17
4
युधिष्ठिर और भीम का अवतार
अपने ही लोगों को मारना उन्हें भाया नहीं। इस प्रसंग के बाद आल्हा सभी राजाओं को संदेश देने लगे कि जब भी कोई विदेशी आक्रमण करे अपने सभी आपसी मतभेद भुलाकर साथ आकर लड़ाई लड़नी चाहिए। लेकिन आल्हा की यह सलाह पृथ्वीराज चौहान और राजा जयचंद ने नहीं मानी। और आल्हा ऐसी स्थिति देखकर वैरागी हो गए।
आल्हा5/17
5
आल्हा
आल्हा जन्म से ही न्याय प्रिय और शांत स्वाभाव का था और उसे युद्ध से नफरत थी. एक क्षत्रिय परिवार में जन्म लेने के कारण आल्हा को युद्ध से नफरत होते हुए भी कभी-कभी युद्ध में जाना पड़ता था. आल्हा को शारदा देवी से अमरता का वरदान प्राप्त था. उसे तलवार से विश्व नष्ट करने की शक्ति मिली थी. वह अजर- अमर था.
6
अमर आल्हा
आल्हा को यह नही मालूम था कि वह अमर था . अपने छोटे एवं प्रतापी भाई ऊदल के मारे जाने पर आल्हा ने कहा था की अगर उससे ये बात पता होती की वो अमर है तो उसके छोटे भाई ऊदल को कभी लड़ाईया नहीं लड़नी पड़ती और ना ही वो कभी मरता.
ऊदल7/17
7
ऊदल
आल्हा का छोटा भाई ऊदल युद्ध प्रेमी था. बुंदेलखंड की जितनी भी लड़ाईया प्रसिद है उनमें ऊदल का नाम ज्यादा लिया जाता हैं. बुंदेलखंड की लगभग सभी लड़ाइयां ऊदल ने लड़ी. ऊदल ने देवराज इंद्र को एक बार धोखे से फंसा कर उनके रथ के 5 घोड़े हथिया लिए थे. इंद्र के छोड़े ऊदल ने कैसे हथिया लिए इसके पीछे भी एक कथा है।
ऊदल8/17
8
ऊदल
कथा के अनुसार इंद्र को मल्हना से प्यार था। वह रोज रथ से रात में मल्हना से मिलने जाया करते थे। ऊदल ने एक बार उन्हें देख लिया। और ऊदल इंद्र की पोल ना खोल दें इसलिए उन्हें ऊदल के मांगने पर अपने पांचों घोड़े देने पड़े। इस तरह उन्होंने इंद्र से पांचों घोड़े हथिया लिए।
9
पराकर्मी ऊदल
ऊदल पराकर्मी होने के साथ - साथ बहुत सुंदर भी था. ऊदल किसी भी काम को करने से पहले उस काम की शपथ लेता था और उससे पूरा करने के लिए जी-जान एक कर देता था. ऊदल के पास उसकी तलवार ही उसका मुख्य अस्त्र था.
आल्हा और ऊदल की लड़ाई10/17
10
आल्हा और ऊदल की लड़ाई
आल्हा और ऊदल एक सफल योद्धा थे। देश में आज भी उन्हें उनकी वीरता के लिए जाना जाता है। उस समय उनकी वीरता के कारनामे काव्य रूप में संरक्षित किए गए। आज भी नीचे लिखी पंक्तियां बोली जाती हैं। बुंदेलखंड की सुनो कहानी बुंदेलों की बानी में पानीदार यहां का घोड़ा, आग यहां के पानी में
बुंदेलखंड में आल्हा ऊदल का नाम11/17
11
बुंदेलखंड में आल्हा ऊदल का नाम
बुंदेलखंड के लोगों की जुबान पर आज भी आल्हा और ऊदल का नाम जीवित हैं. आल्हाखंड में आल्हा-ऊदल की सारी लड़ाइयों को एक साथ लिखा गया हैं. आल्हाखंड में आल्हा-ऊदल के प्रसिद्ध 23 मैदानो में बावन लड़ाइयों को लिखा गया है जिनमें से नैनागढ़ की लड़ाई सबसे रोचक व लोकप्रिय मानी जाती है.
12 ऊदल की वीरता के कारनामें
ऊदल की वीरता के कारनामें
आल्हखंड में ऊदल की वीरता के कारनामें, उसकी तलवार की धार, आल्हा की उदारता और उसकी अमरता को लिखा गया हैं. आल्हा की तलवार में इतना दम था की वो विश्व नाश कर सकती थी परन्तु वो उसको कभी इस्तेमाल नहीं करता था.
युद्ध एक साधारण बात13/17
13
युद्ध एक साधारण बात
बुंदेलखंड में लड़ाई होना बहुत आम बात थी. लोग वहां पर छोटी- छोटी बातों पर लड़ जाते थे. एक लड़ाई में लाखों का मारा जाना साधारण- सी बात थी .लड़ाई चाहे आन-बान को लेकर हो या शान को, लोग एक दूसरे से लड़ जाते थे. लड़ाई होने के कई और कारण थे जैसे की विवाह न होने देना, गॉन के बाद लकी को ना भेजना, किसी स्त्री के लिए प्रेम, देवी - देवताओ की पूजा को लेकर आदि इत्यादि.
जब मामा ने महल से निकलवाया14/17
14
जब मामा ने महल से निकलवाया
आल्हा और ऊदल दोनों ही पराक्रमी योद्धा थे। और उन दोनों के बल पर ही राजा परमालदेव की सत्ता चल रही थी। राजा परमालदेव और उनकी रानी मिलनहा ने दोनों को बहुत प्रेम से पाला पोसा था। दोनों भाई पूरी श्रद्धा से उनकी और उनके राज्य की सेवा करते थे। लेकिन आल्हा के मामा से राजा का अपने भांजों के प्रति प्रेम देखा नहीं गया।
15
जब मामा ने महल से निकलवाया
राजा परमाल ने आल्हा से उसका घोड़ा मांग लिया जिसे आल्हा नहीं दिया। क्योंकि वह राजपूती धर्म के विरुद्ध था। इस पर राजा परमाल ने उसके पूरे को महल से बाहर निकाल दिया। फिर जब पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध हुआ। तब राजा की पत्नी ने अपनी सूझबूझ से दोनों को वापस बुलाया। दोनों भाई अपनी जी जान से लड़े। लेकिन अंत में विजय पृथ्वीराज की हुई।
ऊदल की ह्त्या16/17
16
ऊदल की ह्त्या
बैरागढ़ के मैदान में पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामुंडराय ने धोखे से ऊदल की हत्या कर दी थी. ऊदल की पृथ्वीराज चौहान द्वारा हत्या के बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण किया मगर गुरु गोरखनाथ के आदेश से आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दे दिया था और सन्यास ले लिया था.
आल्हा का मालूम नहीं17/17
17
आल्हा का मालूम नहीं
बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि युद्ध के बाद आल्हा सब कुछ छोड़कर कहीं चला गया था। लेकिन वह कहां गया इसके बार में किसी को नहीं मालूम। और शायद किसी ने यह जानने की कोशिश भी नहीं की आखिर वह कहां गया। और शायद यही वजह है कि आज हम उन्हें अमर मान रहे हैं।
राजपुताना करोड़ों वर्ष पुराना वीर इतिहास
राजपूताना इतिहास और विरासत
राजपूताना इतिहास
राजपूताना इतिहास और रजवाड़े

Comments
Post a Comment